ना मिलते हम कभी शायद कहीं अच्छा ही होता,
ना ये उलझन ही होती, ना कोई परवाह होता||
मोहब्बत दिल में थी दिल में ही रह जाती तड़पती,
न तुम रुसवा ही होती, ना इतना मैं बेबाक होता |
निकलें या के रह जाएँ इन्ही कमरों में सिलकर,
के देखें या नहीं आलिंग के पल में पलटकर |
ना तुम धड़कन पकड़ती, मैं नहीं तड़पन परखता,
ना मिलते हम कभी शायद कहीं अच्छा ही होता,
ना ये उलझन ही होती, ना कोई परवाह होता ||
उतर जायेगा शायद ये नशा उन्नीद फिर भी,
गुज़र जाएंगी ये बाते भी लम्हों में सरकती|
यही होना है बाकी, बस वक़्त मरहम ज़ल्द रखता,
ना मिलते हम कभी शायद कहीं अच्छा ही होता,
ना ये उलझन ही होती, ना कोई परवाह होता||
-- नीरजः
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