Friday, November 21, 2025

Churn of silence


Oh you slurred confessions...

betrayers of the lovely confusion!

dearer to me, than the clarity.

Standing still, shattered, see through

This moment is ticking

longer than the eternity.


Accross the scarced approach field

"We the ends"  closely veiled.

Breathing in the lonely palace.

Ah! Those breachy touch of rosy pallets..

Distressed embosom enveloped in proximity

imploded the guarded everlasting chastity 

 

Glued to the green eyes,

My vision remains paired in the past

Clearer though misty.

hands are coupled, ever holding you

with ever lingering caress

filled with you but thirsty.

Friday, November 7, 2025

ना मिलते हम कभी


ना मिलते हम कभी शायद कहीं अच्छा ही होता,

ना ये उलझन ही होती, ना कोई परवाह होता||

मोहब्बत दिल में थी दिल में ही रह जाती तड़पती,

तुम रुसवा ही होती, ना इतना मैं बेबाक होता |


निकलें या के रह जाएँ इन्ही कमरों में सिलकर,

के देखें या नहीं आलिंग के पल में पलटकर |

ना तुम धड़कन पकड़ती, मैं नहीं तड़पन परखता,

ना मिलते हम कभी शायद कहीं अच्छा ही होता,

ना ये उलझन ही होती, ना कोई परवाह होता ||


उतर जायेगा शायद ये नशा उन्नीद फिर भी, 

गुज़र जाएंगी ये बाते भी लम्हों में सरकती|

यही होना है बाकी, बस वक़्त मरहम ल्द रखता,

ना मिलते हम कभी शायद कहीं अच्छा ही होता,

ना ये उलझन ही होती, ना कोई परवाह होता||


-- नीरजः

Sunday, September 10, 2017

अली बाबा, चालीस चोर और अल - जिहाद


पूज्य आचार्य रजनीश 'ओशो' कहा करते थे कि हर कहानी झूठी है, रचनाकार द्वारा अपनी विचारधारा को प्रचारित करने का छद्म अर्थात प्रोपगंडा | जैसे ही विचारधारा का मंतव्य समाप्त, कहानी समाप्त | इसलिए प्रायः सभी कहानियां अधूरी हैं, कुछ कहती हैं, कुछ नहीं कहती है ... बात दबा ले जाती हैं | असली कहानियां सतत होती हैं ... अंतहीन |

सिंध के गाँव और मंदिर लूटकर अरबी लुटेरों का एक गिरोह एक पहाड़ी के पास आकर रुका | हर लुटेरे के साथ दो घोड़े, एक पर वह खुद बैठा था और दूसरे पर लूट के बहुमूल्य आभूषण, स्वर्ण, माणिक्य, देवी देवताओं की धातु मूर्तिया आदि लादे गए थे | सबसे आगे वाला लुटेरा जो कि संभवतः गिरोह का सरगना था, मुड़ा और बाकि लुटेरों के सम्मुख हो बोला - "अल्लाह के नेक बन्दों, इतनी दौलत अल्लाह ने मुशरिकों को इसलिए अता की थी के एक दिन अल - ईमान के हम नेक बन्दे इसे अपने नाम कर सकेँ | पर सनद रहे , अल - किताब की आयत 8:69 कहती है की काफिरों मुशरिकों से लड़कर जीते हुए असबाब पे हकूक हम सबका है, हम सब का बराबर का अख्तियार है | इसलिए आओ ये सारा माल इस जादुई दरवाज़े के पीछे रखकर हम पहले अपने साथ लूटकर लायी लौंडी और लौंडों की खिदमत कबूलें | अगली जुम्मेरात को इस दौलत का बटवारा किया जायेगा" | फिर अपनी तलवार उठाकर चीखते हुए बोला "नारा-ए -तकबीर" ... पीछे ४० घुड़सवार लुटेरों ने तामीर करते हुए - "अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर " | फिर सरगना पहाड़ी में बने एक दरवाजे की तरफ मुड़ा और जोर से बोला - "खुल जा सिमसिम" -- घरघराते हुए दरवाजा खुला और सभी लुटेरे अन्दर चले गए | फिर अन्दर जाकर सरगना बोला "बंद हो जा सिमसिम" | लूट का सारा माल अन्दर रखकर लुटेरे बाहर आये, दरवाजे को उसी अंदाज़ में बंद करके पास के एक गाँव में सिंध से लूट कर लायी लड़कियों , महिलाओं और बच्चो का भोग करने चले गए |


ये सारी घटना पेड़ के पीछे छुपा अली बाबा देख रहा था ... दिन भर लकड़ियाँ बटोरने वाला अलीबाबा इतनी अकूत संपत्ति देखकर पागल सा हो गया ... तभी उसे पवित्र कुरआन की ज़कात सम्बन्धी आयतें याद आने लगीं | उसने सोचा की क्यों न इस लूट के माल पे इस गरीब का भी हक हो | घर जाकर उसने ये सब अपने परिवार से बताया ... फिर इस लूट के धन को चुराने की योजना बनाई और उसपर अमल भी किया | पर ये बात लुटेरों को पता लग गयी ... लुटेरों ने अलीबाबा को मारने की योजना बनाई | पर यहाँ अलीबाबा के काम आई फारस/ईरान की लौंडी मरजीना |

मरजीना एक जोरो लड़की थी | फ़ारस (आज का इरान) में इस्लाम के आक्रमण से पहले जोरो सभ्यता फली फूली थी ... जोरो लोग भी काफिर मुशरिक थे, सूर्य के उपासक थे, बड़े आजाद ख्याल और ज्ञानी लोग | आज यदि अरबी किसी ज्ञान-विज्ञान पे अपने पूर्वजों का हक जताते हैं तो वो उनके पूर्वजों का नहीं बल्कि इन्ही जोरो और भारतीय मुशरिकों का ज्ञान - विज्ञान है |
अल - मज़हब इस्लाम के अल जिहाद के आगे जोरो लोग ५० साल भी न टिक सके, धुल में मिल गयी जोरो सभ्यता ... वहीँ से लूटकर आई लौंडियों में से एक लौंडी की तीसरी पीढ़ी थी मरजीना... बड़ी चालक थी, उम्र में अलीबाबा की बेटी जैसी पर बला की कमसिन | अलीबाबा उसपर अपनी जान छिड़कता था , हर काम उससे पूछकर ही करता था |

मरजीना ने लुटेरों से निबटने की योजना बनाई| उसने अपने जलवे दिखाकर लुटेरों को नशा दिया फिर खौलता हुआ तेल डालकर उन्हें मार दिया | अलीबाबा खुश हुआ , सारी संपत्ति उसकी हुई | साथ ही लुटेरों द्वारा लायी गयी नयी सिन्धी लौंडिया और लौंडे भी मिले ... सो अलीबाबा ने फारस की उस कनीज़ मरजीना का अपने पुत्र के साथ निकाह कर दिया ... वेश्या से भी बदतर जीवन जीने वाली मरजीना को और क्या चाहिए था ... यह सम्मान पाकर वह कृतकृत्य हुई |


इसप्रकार सिंध के काफिरों मुशरिकों से लूटा धन, अरब के शांतिप्रिय अलीबाबा के हाँथ लगा और इस काम में उसकी मदद की जोरो लड़की मरजीना ने ... अल्लाह के फज़ल से काफ़िर ही काफिरों के खिलाफ काम आ जाते हैं |


ये कहानी आज भी ख़त्म नहीं हुई ... आगे भी ख़त्म नहीं होगी ... अल - मज़हब की तासीर ही कुछ ऐसी है




हर हर महादेव

उजड्ड

Monday, April 17, 2017

वैदेही वन जा रही क्यों कष्ट पाने के लिए

वन गमन से पहले माता कैकेयी से आशीष प्राप्त करने गयी वैदेही जानकी को माता कैकेयी आग्रह पूर्वक वन जाने से रोकना चाहती हैं परन्तु जानकी अपने निश्चय पर अटल है | उनके बीच के संवाद का कुछ अंश| बाल्यकाल में दादी से बहुत सारे भजन सुने थे। .. अत्यधिक भावुक हो कर गाती थीं... जितना गाती थीं... रोती जाती थीं ... इतना भाव प्रवीण गायन। उनके एक भजन की बस एक ही पंक्ति मुझे याद है ...
"वैदेही वन जा रही क्यों कष्ट पाने के लिए" | हमारी निकम्मी पीढ़ी ने उन अमूल्य भजनों को संगृहीत करने का तनिक भी कष्ट नहीं किया ...  बस उस एक पंक्ति के सहारे कुछ और वाक्य जोड़ने का प्रयास है |



कैकेयी --

है यहाँ प्रासाद का

वैभव पड़ा तेरे लिए

वैदेही वन जा रही

क्यों कष्ट पाने के लिए || १ ||

दास दासी नगर वासी

प्रस्तुत खड़े आठों प्रहर

क्या करोगी वन में बेटी

आकाश छत, प्रस्तर का घर || २ ||

पुष्प के पर्यंक पे

सोने से जो कुम्हला गयी

नींद आयेगी उसे

कैसे भला चट्टान पर  || ३ ||


वैदेही --

कष्ट क्या सुख क्या है माता

मन के दो आयाम है

श्री राम संग संघर्ष करने 

में परम कल्याण है || ४ ||

क्या करुँगी धन का

वैभव का बड़े प्रासाद का

राम के चरणों से बढ़कर

कौन सा सुखधाम है || ५ ||

जा रही हूँ मातु किंचित

शोक दुःख मत कीजिये

नियति का अवसर मिला है

धर्म धारण के लिए || ६ ||



Tuesday, September 20, 2016

फप्रेक्


नर ने जोर से छींका, मादा ने अपने संतरे की फांको जैसे फुले, रक्ततप्त ओठों को आलस्य सहित उचारते हुए कहा - ब्लेस यु... ट्रेनिग कक्ष में समय कुछ पलों के लिए मानो ज़िदिया गया... आगे न बढ़ने की कसम खा ली टाइम भइया ने। खडूस मास्टर ने धकियाते हुए समय को ठेला और अध्यापन पुनः जारी किया... नर मादा की खुसर पुसर नियमित रही... जाते जाते दोनों ने साथ साथ मधुशाला जाने की योजना बनायीं... ये सब खड़े कानों से सुनते उजड्ड साहब की इन्द्रियां बेतहासा सिग्नल फेंकने लगीं...

आगे? आगे क्या हुआ उसके लिए उजड्ड संजय हुआ जाता है... हाँ तो मित्रों मधुशाला में स्नेह की परिणीति प्रेम में हुई, प्रेम से अगाध प्रेम, फिर कहीं रात्रि आश्रय, फिर चरम प्रेम... फिर प्रेम का स्खलन।
अगले दिन मादा और नर कक्ष में विकर्णवत बैठे... यथा संभव दूरी बनाये हुए... उजड्ड साहब मुस्कुराते हुए बोले "ई तो स्साला होना ही था" और अपनी इन्द्रियों के आइय्यरी की मन ही मन सराहना करने लगे ।

हर हर महादेव
- उजड्ड बनारसी

फेमिनिस्ट कविता


तुम मेरे धुन की न सोचो
लय मत गढ़ो...
छंद पे मत कसो
मैं अब अनगढ़ हो गयी हूँ
निरक्षर तो नहीं मगर
अनपढ़ हो गयी हूँ


नहीं गद्य नहीं कहो मुझे
गद्य पुरुषवादी सत्ता का प्रतीक सा है
बेरुखा, घमंडी, चुभने वाला, अकड़ू, बेहूदा है
गद्य अभ्यास से है,मेरा अस्तित्व आभास से है
गद्य न कहो मैं फेमिनिस्ट कविता हूं


अपना रूप लावण्य त्याग बनी स्वेच्छिक विधवा हूँ
कंधे से कन्धा मिलाना सीखा है मैंने
उस पुरुष गद्य से लड़ना सीख है मैंने
तो क्या जो मेरा छंद टूट गया
तो क्या मेरे लय का स्पन्द छूट गया..
रस को दग्ध कर अलंकार पिघला डाले
और उसके सिक्के बना डाले
आड़ी टेढ़ी पंक्तियों में ढल
बेतरतीबी से बिखरे पड़े अल्प और पूर्ण विरामों का भ्रमजाल ओढ़े साहित्य की दुहिता हूँ
मैं आज की नयी कविता हूँ



- कृते "उजड्ड"
हर हर महादेव

"जुड़" जाना संवाददाता से


कुकुर युगल का "जुड़" जाना चोरी छुपे, हँसते लजाते लगभग सभी ने देखा होगा। भौतिक विज्ञान की दृष्टि से इस प्रकार से जुड़ने के लिए कुक्कुर युगल को सशरीर एक ही स्थान पर परस्पर विपरीत दिशा में उपस्थित होना होता है... मगर हमारे समाचार चैनलों ने इस तकनीक में जबरजोर तरक्की और सफलता अर्जित की है। जैसे ही किसी समाचार में तड़का लगाना होता है, ये नोयडा में बैठे बैठे मुम्बई के ठाड़े में अपने संवाददाता से "जुड़" जाते हैं..

रिमोटली "जुड़" जाने की कला विकासित कर ली है हमारे समाचार चैनलों ने... तन से तन का मिलन हो न पाये तो क्या मन से मन का मिलन कोई कम तो नहीं के तर्ज पे ये लोग मन ही मन "जुड़" जाते हैं।
इस क्रम में साक्षात्कार कुछ ऐसे होता है... तो आइये ले चलते हैं आपको सीधा कैशाम्बी जहाँ डॉ कुमार विश्वास हमसे "जुड़" चुके हैं... हाँ तो डॉक्टर विश्वास, बताइये हमसे "जुड़" के कैसा महसूस कर रहे हैं....

ये लोग आव देखते हैं न ताव, बस जुड़ जाते हैं। मुम्बई में बारिश हुई... "जुड़" गए, बुंदेलखंड में "सूखा" पड़ा... जुड़ गए, दिग्गी सर ने शादियां की... "जुड़" गए, थरूर साहब पाकिस्तानी मेहर तरार से "जुड़" गए...
अभी अभी ठाड़े में एक शांतिप्रिय छोटा परिवार सुखि परिवार के मात्र 13 लोगों को उनके ही घर के शांतिदूत ने जहरखुरानी से हालाक् कर दिया... ABP न्यूज़ का एंकर झट से अपने ठाड़े संवाददाता से "जुड़" गया... शाम को rNDTV पे रवीश जी भी "जुड़" जाएंगे... जुड़ो भाई, हमें क्या... अल्लाह तुम्हारी "जुड़ाई" सलामत रखें...


- उजड्ड
हर हर महादेव